बिसौली। नगर की मस्जिद बिलाल के इमाम हाफिज शादाब रजा उवैसी ने बताया कि रमजान के महीने में अल्लाह तआला की इबादत करने और रोजा रखने से रोजदारों पर रहमतों की बरसात होती है। अल्लाह अपने बंदों के सारे गुनाह माफ कर देता है। शादाब रजा साहब ने बताया कि रमजान के महीने में 29 या 30 दिनों तक रोजा रखा जाता है। यह रोजे तीन अशरों में बंटे होते हैं। 10 रोजे का एक अशरा होता है। पहला अशरा रहमत या बरकत का होता है। दूसरा अशरा मगफिरत का और तीसरा अशरा दोजख या जहन्नम से आजादी दिलाने वाला होता है। हाफिज शादाब रजा साहब ने बताया कि तीसरे अशरे को इसलिए भी खास माना जाता है, क्योंकि इसी अशरे में वो खास रातें पड़ती हैं जिन्हें शब – ए – कद्र या लैलतुल कद्र भी कहा जाता है।
रमजान का दूसरा अशरा ढलने के बाद इन रातों की शुरुआत होती है। तीसरे अशरे के 10 दिनों में शबे कद्र की पांच महत्वपूर्ण रातें पड़ती हैं, जिन्हें बहुत ही पाक माना जाता है। इसमें की गई दुआओं का बहुत असर होता है। हाफिज शादाब रजा उवैसी साहब ने बताया कि 21 वें रोजे के साथ तीसरे अशरे की शुरुआत हो जाती है। 21 वें रोजे से शुरू होकर यह चांद के अनुसार 29 वें या 30 वें रोजे तक होता है। तीसरी अशरे में की गई दुआओं से जहन्नुम की आग से निजात मिलती है। उन्होंने बताया इस दौरान हर मुसलमान दोजख की आग से बचने के लिए दुआ करता है। तीसरा अशरा शुरू होते ही मस्जिद और घरों में एतकाफ का सिलसिला भी शुरू हो जाता है। इस दौरान फितरा और जकात भी अदा की जाती है।
